Monday, March 22, 2021

अवतार सिंह पाश की सात कविताएं



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1⃣ सपने
सपने हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोयी आग को सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई हथेली पर आये
पसीने को सपने नहीं आते
शैल्फ़ों में पड़े इतिहास के ग्रन्थों को
सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाजिमी है
सहनशील दिलों का होना
सपनों के लिए नींद की नज़र होनी लाजिमी है
सपने इसीलिए सभी को नहीं आते
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2⃣ सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-सोए पकड़े जाना – बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ने लग जाना – बुरा तो है
भींचकर जबड़े बस वक्‍त काट लेना – बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र के लिए रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वह आँख होती है
जो सबकुछ देखती हुई भी ठण्डी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को
मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन की
भाप पर मोहित हो जाती है
जो रोज़मर्रा की साधारणतया को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दोहराव के दुष्चक्र में ही गुम जाती है

सबसे ख़तरनाक वह चाँद होता है
जो हर कत्ल-काण्ड के बाद
वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है
लेकिन तुम्हारी आँखों में मिर्चों की तरह नहीं लड़ता है

सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
तुम्हारे कान तक पहुंचने के लिए
जो विलाप को लाँघता है
डरे हुए लोगों के दरवाज़े पर जो
गुण्डे की तरह हुँकारता है
सबसे ख़तरनाक वह रात होती है
जो उतरती है जीवित रूह के आकाशों पर
जिसमें सिर्फ उल्लू बोलते गीदड़ हुआते
चिपक जाता सदैवी अँधेरा बन्द दरवाज़ों की चैगाठों पर

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाये
और उसकी मुर्दा धूप की कोई फांस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में चुभ जाये

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

(पाश की पंजाबी में प्रकाशित अन्तिम कविता, जनवरी, 1988)
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3⃣ अपनी असुरक्षा से

यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना ज़मीर होना ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाये
आँख की पुतली में 'हाँ' के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूँज की तरह गलियों में बहता है
गेहूँ की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझे थे क़ुर्बानी-सी वफ़ा
लेकिन 'गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है
'गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे ख़तरा है

'गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे
कीमतों की बेशर्म हँसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से ख़तरा है

'गर देश की सुरक्षा ऐसी होती है
कि हर हड़ताल को कुचलकर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मरकर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक़्ल, हुक़्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
मेहनत, राजमहलों के दर पर बुहारी ही बनेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है।
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4⃣ दो और दो तीन

मैं प्रमाणित कर सकता हूँ -
कि दो और दो तीन होते हैं।
वर्तमान मिथिहास होता है।
मनुष्य की शक्ल चमचे जैसी होती है।
तुम जानते हो -
कचहरियों, बस-अड्डों और पार्कों में
सौ-सौ के नोट घूमते फिरते हैं।
डायरियाँ लिखते, तस्वीरें खींचते
और रिपोर्टें भरते हैं।
'कानून रक्षा केन्द्र' में
बेटे को माँ पर चढ़ाया जाता है।
खेतों में 'डाकू' मज़दूरी करते हैं।
माँगें माने जाने का ऐलान
बमों से किया जाता है।
अपने लोगों से प्यार का अर्थ
'दुश्मन देश' की एजेण्टी होता है।
और
बड़ी से बड़ी ग़द्दारी का तमग़ा
बड़े से बड़ा रुतबा हो सकता है
तो -
दो और दो तीन भी हो सकते हैं।
वर्तमान मिथिहास हो सकता है।
मनुष्य की शक्ल भी चमचे जैसी हो सकती है।
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5⃣ सच

तुम्हारे मानने या न मानने से
सच को कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
इन दुखते अंगों पर सच ने एक उम्र भोगी है।
और हर सच उम्र भोगने के बाद,
युग में बदल जाता है,
और यह युग अब खेतों और मिलों में ही नहीं,
फ़ौजों की कतारों में विचर रहा है।
कल जब यह युग
लाल किले पर बालियों का ताज पहने
समय की सलामी लेगा
तो तुम्हें सच के असली अर्थ समझ आयेंगे।
अब हमारी उपद्रवी जाति को
इस युग की फितरत तो चाहे कह लेना,
लेकिन यह कह छोड़ना,
कि झोंपड़ियों में फैला सच,
कोई चीज़ नहीं।
कितना सच है?
तुम्हारे मानने या न मानने से,
सच को कोई़ फ़र्क नहीं पड़ता।
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6⃣ भारत

भारत -
मेरे आदर का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयुक्त किया जाये
शेष सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।
इस शब्द का अभिप्राय
खेतों के उन बेटों से है
जो आज भी पेड़ों की परछाइयों से
वक़्त मापते हैं।
उनकी पेट के बिना, कोई समस्या नहीं
और भूख लगने पर
वे अपने अंग भी चबा सकते हैं।
उनके लिए जि‍न्दगी एक परम्परा है,
और मौत का अर्थ है मुक्ति।
जब भी कोई पूरे भारत की,
'राष्ट्रीय एकता' की बात करता है
तो मेरा दिल करता है -
उसकी टोपी हवा में उछाल दूँ,
उसे बताऊँ
कि भारत के अर्थ
किसी दुष्यन्त से सम्बन्धित नहीं
बल्कि खेतों में दायर हैं
जहाँ अनाज पैदा होता है
जहाँ सेंधें लगती हैं---
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7⃣ बेदख़ली के लिए विनय-पत्र
(इन्दिरा गाँधी की मृत्यु तथा इसके पश्चात सिखों के कत्ले-आम पर एक प्रतिक्रिया)

मैंने उम्र भर उसके खि़ला़फ़ सोचा और लिखा है
अगर उसके शोक में सारा ही देश शामिल है
तो इस देश में से मेरा नाम काट दो

मैं ख़ूब जानता हूँ नीले सागरों तक फैले हुए
इस खेतों, खदानों और भट्ठों के भारत को
वह ठीक इसी का साधारण-सा कोई कोना था
जहाँ पहली बार
जब मज़दूर पर उठा थप्पड़ मरोड़ा गया
किसी के खुरदुरे बेनाम हाथों में
ठीक वही वक़्त था
जब इस कत्ल की साज़ि‍श रची गयी
कोई भी पुलिस नहीं ढूँढ़ सकेगी इस साज़ि‍श की जगह
क्योंकि ट्यूबें केवल राजधानी में जगती हैं
और खेतों, खदानों, भट्ठों का भारत
बहुत अँधेरा है

और ठीक इसी सर्द-अँधेरे में होश सँभालने पर
जीने के साथ-साथ
जब पहली बार इस जि‍न्दगी के बारे में सोचना शुरू किया
मैंने ख़ुद को इसके कत्ल की साज़ि‍श में शामिल पाया
जब भी भयावह शोर के पदचिह्न देख-देख कर
मैंने ढूँढ़ना चाहा टर्रा-र्रा-ते हुए टिड्डे को
शामिल पाया है, अपनी पूरी दुनिया को
मैंने सदा ही उसे कत्ल किया है
हर परिचित व्यक्ति की छाती में से ढूँढ़कर
अगर उसके कातिलों के साथ यूँ ही सड़कों पर निपटना है
तो मेरे हिस्से की सज़ा मुझे भी मिले
मैं नहीं चाहता कि केवल इसलिए बचता रहूँ
कि मेरा पता नहीं है भजन लाल बिश्नोई को -
इसका जो भी नाम है - गुण्डों की सल्तनत का
मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूँ
मैं उस पायलट की
कपटी आँखों में चुभता भारत हूँ
हाँ, मैं भारत हूँ चुभता हुआ उसकी आँखों में
अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है
तो मेरा नाम उसमें भी अभी काट दो

* भजन लाल बिश्नोई - हरियाणा का तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री (नवम्‍बर 1984)

Sunday, February 21, 2021

किसान आंदोलन तथा श्रम कानूनों में संशोधन के खिलाफ मजदूर आंदोलन तेज करो !


आज बिहार निर्माण व असंगठित श्रमिक यूनियन की तरफ से राजेंद्र नगर -कुमहरार कमिटी ने मुसल्लहपुर हाट तथा सैदपुर के इलाके में जन विरोधी कृषि कानून तथा  श्रम कानूनों में हुए सुधार के खिलाफ मजदूरों को जागृत करने का अभियान चलाया | यूनियन के साथी कॉम इंद्रजीत तथा साथी रंजीत मजदूरों के बीच अपनी बात रखते हुए : - -
यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि मजदूरों के काम के घंटे और मनमाना शोषण के लिए मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव के बाद  कृषि कानून ऐसे बदलाव लाए गए ताकि सरकार अपनी जमीन तथा उत्पादन के साधनों को बड़ी पूंजी के हाथों खोकर मजदूर बन जाए ।  यह ऐसी स्थिति है जिसमें मोदी सरकार वित्त पूंजी तथा भारतीय एकाधिकार पूंजी [अदानी अंबानी टाटा आदि ) के फायदे के लिए न सिर्फ मजदूरों का शोषण तीव्र कर दिया है बल्कि किसानों का भी संपत्ति हरण कर उन्हें बेहाल कर रहा है ।इस मायने में किसान आंदोलन भावी मजदूरों के जीवन के संकटों के खिलाफ होने वाली लड़ाई का पहला चरण है । इस लड़ाई में मजदूरों को शामिल होकर न सिर्फ कृषि कानून , बल्कि श्रम कानूनों में हुए बदलाव के खिलाफ लड़ने के लिए किसानों  के साथ संयुक्त मोर्चा बनाना समय की मांग है ।

फ़्रेडरिक एंगेल्स

" विज्ञान जितनी दृढ़ता और निस्पृहता के साथ आगे बढ़ता है, वह मजदूरों के हितों और आकांक्षाओं के साथ उतना ही सामंजस्य स्थापित करता है. "  फ़्रेडरिक एंगेल्स

Friday, February 19, 2021

विज्ञान की दुनिया का पहला शहीद (ब्रूनो)

विज्ञान की दुनिया का पहला शहीद (ब्रूनो) था
यह कहानी निकोलस कॉपरनिकस (1473 -1543) से शुरू होती है। वे पोलैंड के रहने वाले थे । गणित व खगोल में इनकी रुचि थी।
खगोल में अब तक हमारे पास टालेमी का दिया हुआ ब्रह्मांडीय मॉडल था। इसके अनुसार पृथ्वी स्थिर थी और केंद्र में थी व सभी अन्य खगोलीय पिंड इसके चारों ओर चक्कर लगाते दर्शाए गए थे। विद्वानों ने इसका समय-समय पर अध्ययन किया था। गणितीय दृष्टि से कुछ दिक्कतें थी जो इस मॉडल से हल नहीं हो रही थी।
कॉपरनिकस का मानना था कि यदि पृथ्वी की बजाए सूर्य को केंद्र में रख लिया जाए तो काफी गणनाए सरल हो सकती हैं। कॉपरनिकस साधु स्वभाव का व्यक्ति था । वह समझता था कि यदि उसने अपना मत स्पष्ट कर दिया तो क्या कुछ हो सकता है। वह चर्च के गुस्से को समझता था, सो उसने चुप रहना उचित समझा। लेकिन उसने अध्ययन जारी रखे। वह बूढ़ा हो गया और उसे अपना अंत निकट लगने लगा। उसने मन बनाया कि वह अपना मत सार्वजनिक करेगा।
उसने यह काम अपने एक शिष्य जॉर्ज जोकिम रेटिकस को सौंप दिया कि वह इन्हें छपवा दे। उसने यह काम अपने एक मित्र आंद्रिया आसियांडर के हवाले कर दिया। इन्होंने कॉपरनिकस की पुस्तक प्रकाशित करवा दी। यह उसी समय प्रकाशित हुई जब कॉपरनिकस मृत्यु शैया पर था। वह इसकी जांच पड़ताल नहीं कर सकता था। आंद्रिया आसियांडर एक धार्मिक व्यक्ति था। इसका मत कॉपरनिकस के मत से मेल नहीं खाता था। इन्होंने बिना किसी सलाह या इजाजत के पुस्तक में कुछ फेरबदल किए। उन्होंने पुस्तक की भूमिका में यह लिख दिया कि कॉपरनिकस की यह सब कल्पना है, यथार्थ अध्ययन नहीं हैँ। पुस्तक के नाम में भी कुछ बदलाव किया। प्रकाशित होते ही यह चर्च की निगाह में आई। चर्च नहीं चाहता था कि किसी भी वैकल्पिक विचार की शुरुआत हो। चर्च ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया और सभी प्रतियां जब्त कर ली। किसी तरह कुछ प्रतियां बच गई। चर्च ने समझा अब बात आगे नहीं बढ़ेगी।
कुछ समय तक सब शांत रहा। एक बार इटली का एक नवयुवक गीयरदानो ब्रूनो 1548 - 1600) चर्च में कुछ पढ़ रहा था, वह पादरी बनना चाहता था। किसी तरह उसके हाथ कॉपरनिकस की पुस्तक लग गई। इन्होंने यह पढी। इनकी इस पुस्तक में दिलचस्पी बढ़ी। इन्होंने सोचा कि क्यों एक व्यक्ति किसी अलग विचार पर बहस करना चाहता है। इन्होंने इस विषय पर आगे अध्ययन करने का मन बनाया। पादरी बनने की उनकी योजना धरी की धरी रह गई। जैसे-जैसे वह अध्ययन करता गया उसका विश्वास मजबूत होता गया। वह भी चर्च की ताकत और गुस्से को समझता था। इसलिए उन्होंने इटली छोड़ दी। वह इस मत के प्रचार के लिए यूरोप के लगभग एक दर्जन देशों (प्राग , पैरिस, जर्मनी, इंग्लैंड आदि) में घूमा।
चर्च की निगाह हर जगह थी। कुछ विद्वान इसके मत से सहमत होते हुए भी चर्चा करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। चर्च की निगाह में ब्रूनो अब भगोड़ा था। वह जितना भी प्रचार करता चर्च की निगाह में उसका जुर्म उतना ही संगीन होता जाता था। वह छिपता तो भी कहां और कब तक? वैचारिक समझौता उसे मंजूर नहीं था। चर्च ने ब्रूनो को पकड़ने के लिए एक जाल बिछाया। एक व्यक्ति को तैयार किया गया कि वह ब्रूनो से पढ़ना चाहता है। फीस तय की गई। ब्रूनो ने समझा कि अच्छा है एक शिष्य और तैयार हो रहा है। ब्रूनो इस चाल को समझ नहीं पाया। उसने इसे स्वीकार किया और बताए पते पर जाने को तैयार हो गया। इस प्रकार वह चर्च के जाल में फंस गया। जैसे ही वह पते पर पहुंचा चर्च ने उसे गिरफ्तार कर लिया।
चर्च ने पहले तो इन्हें बहुत अमानवीय यातनाएं दी। उसे एकदम से मारा नहीं। चर्च ने उसे मजबूर करना चाहा कि वह अपना मत वापस ले ले और चर्च द्वारा स्थापित विचार को मान ले। ब्रूनो अपने इरादे से टस से मस नहीं हुआ। चर्च ने लगातार 6 वर्ष प्रयास किए कि वह बदल जाए। उसे लोहे के संदूक में रखा गया जो सर्दियों में ठंडा और गर्मियों में गर्म हो जाता था। किसी भी तरह की यातनाएं उसके मनोबल को डिगा नहीं पाई। अब तक चर्च को भी पता चल चुका था कि ब्रूनो मानने वाला नहीं है। न्यायालय का ड्रामा रचा गया। चर्च ने सजा सुनाई कि इस व्यक्ति को ऐसे मौत दी जाए कि एक बूंद भी रक्त की न बहे। ब्रूनो ने इस फरमान को सुना और इतना ही कहा-' आप जो ये मुझे सजा दे रहे हो, शायद मुझसे बहुत डरे हुए हो'
17 फरवरी सन 1600 को ब्रूनो को रोम के Campo dei Fiori चौक में लाया गया। उसे खंभे से बांध दिया गया। उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया ताकि वह कुछ और न बोल सके। उसे जिंदा जला दिया गया।
इस प्रकार ब्रूनो विज्ञान की दुनिया का पहला शहीद बना।
लोग वर्षों से मान्यताओं, धारणाओं, प्रथाओं और भावनाओं के पीछे इतने पागल हैं कि वे अपने विचारों से अधिक न कुछ सुनना चाहते हैं और न देखना। बदलना व त्यागना तो उससे भी बड़ी चुनौती है। यह जो एक डर बनाया जाता है असल में वो कुछ लोगों के एकाधिकार के छिन जाने के कारण बनाया जाता है, इसलिए वे इस डर को बनाये रखने की हिमायती है बशर्ते उसके पीछे कितनी ही कल्पनायें क्यों न गढ़नी पड़ जाए।
 *पोस्ट साभार :- श्री आर पी विशाल*

मजदुरो को न्यूनतम मजदूरी नही, किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नही, पूंजीवाद में मजदुरो किसानों की यही नियति!

किसान आंदोलन में मजदूरों के शोषण की जब बात होने लगे,तब आंदोलन को किस दिशा में जाते हुए माना जाना चाहिए?

किसान आंदोलन की यह आवश्यकता बन गई है कि यह जीत हासिल करने के लिए अपने मित्र साथी की तलाश करें । छोटी पूंजी के मालिक व धनी किसान भी अब यह महसूस करने लगे हैं कि बिना मजदूरों तथा व्यापक मेहनतकश आबादी की मदद के इस फासीवादी सत्ता और बडे पूंजीपतियों के खिलाफ लड़ाई नहीं जीती जा सकती है ।इसी का परिणाम है कि अब गुरनाम सिंह चढुनी जैसे धनी किसान भी बड़े पूंजीपतियों के खिलाफ किसानों और मजदूरों की एकता की बात कर रहे हैं । वह मजदूरों के न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी मिलने का हवाला दे रहे हैं और किसानों के फसल के न्यूनतम मूल्य से भी कम मूल्य मिलने का उदाहरण देकर मजदूर और किसान एकता की बात कर रहे हैं । उनके अनुसार आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी कि लोगों का , लोगों के द्वारा लोगों के लिए सरकार बने लेकिन आज भारत में पूंजीपतियों का , पूंजीपतियों के द्वारा पूंजीपतियों के लिए  सरकार चल रही है ।
आंदोलन के मुद्दे और आंदोलन का फलक विस्तार पा रहा है । परिस्थितियां पूंजीवादी लोकतंत्र को नंगा कर रहा है ' । वैचारिक बहस और आंदोलन को पूरी ताकत से जारी रखा जाना चाहिए और मजदूर वर्ग की एकता और किसानों के साथ संयुक्त मोर्चा की व्यापक संभावनाओं की तलाश करनी चाहिए ।

यह कटु सच्चाई है कि आज की तारीख में मजदूर वर्ग न तो संगठित है और न ही उसकी मजबूत कोई पार्टी है । मजदूर आगे बढ़कर किसानों का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं है .लेकिन पिछले दशकों में लगातार हमले झेलते मजदूर वर्ग भी किसानों के आंदोलन से ऊर्जा पार्क करके अंदर से चेतनशील हो रहा है । मजदूर वर्ग के प्रतिनिधियों को आज ज्यादा से ज्यादा उनके सवालों और देश के हालात को लेकर उनके बीच जाना चाहिए । एक समय था कि मजदूर वर्ग की राजनीति सुधारबाद और नव उदारवादी विचारधाराओं के सुनामी में डूबता उतरता नजर आ रहा था, लेकिन आज उसे लोग सुन रहे हैं ।  आज उस के मुद्दे पर लोग बात कर रहे हैं । हमें उस मुद्दे को अपने वर्ग के बीच में और स्पष्टता के साथ रखने का अभियान चलाना है। हमें बताना है कि जब पूरी दुनिया में उत्पादन का सामाजीकरण हो रहा है , तो पहले से समाज तथा राज्य के नियंत्रण में चल रहे कारखाने और साधनों को पूंजीपतियों को देने के खिलाफ खड़ा होना होगा। हमें छोटी पूंजी के मालिकों को बताना होगा कि पूंजीवादी व्यवस्था के अंदर आपकी यह छोटी दुनिया सुरक्षित नहीं रह सकती है । इसलिए पूरी दुनिया के साधनों के सामा जीकरण का हिस्सा बनकर अपनी पीढ़ियों के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित कीजिए। हमें उन्हें बताना है कि जब तक बड़ी पूंजी के मालिकों के हाथ से उत्पादन के सभी साधनों को छीन कर उसका सामाजीकरण नहीं किया जाएगा , सुपर मुनाफा के बल पर हमेशा आपको और मेहनतकश मजदूर वर्ग को तबाह करते रहेंगे । आज हमारी बातों पर उन्हें विश्वास नहीं होगा , लेकिन आंदोलन जिन परिस्थितियों को तैयार कर रहा है सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में यह बात सुनी जा रही है ।

नरेंद्र कुमार

'Parcha 18 Feb 2021 Bihar Nirman.pdf'

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बजट

एम एस पी बचाओ आंदोलन और वित्त पूंजी


एम एस पी की लड़ाई डब्ल्यू टी ओ के शागीर्द वित्त पूंजी तथा भारतीय एकाधिकार पूंजी के खिलाफ राजकीय पूंजीवाद को मजबूत बनाएं रखने की लड़ाई है । खुले बाजार और पूंजी के बेलगाम बाजार पर एकाधिकार की छूट के खिलाफ लड़ाई है ।मजदूर वर्ग सहित सभी मेहनतकश वर्ग यदि पूंजी तथा खुले बाजार के वर्चस्व तथा एकाधिकार के खिलाफ संघर्ष में आगे बढ़कर नेतृत्व करने की स्थिति में होंगे तो समाजवाद की लड़ाई लड़ेंगे। यदि नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं होंगे, तब भी उस लड़ाई में साथ देंगे और सभी मेहनतकशो को समाजवाद के लिए तैयार करने की मुहिम चलाएंगे । लेकिन किसी भी स्थिति में छोटे पूंजीपतियों के हवाले को सामने रखकर के वित्त पूंजी  और एकाधिकार पूंजी द्वारा खुले बाजार में मेहनतकश उत्पादक शक्तियों को तबाह होकर सर्वहारा बनने का जश्न नहीं मनाएंगे !
सर्वहारा का राज्य सभी छोटे किसानों का उत्पाद खरीदने तथा उत्पादन के साधन उन्हें मुहैया करना सुनिश्चित करता है । अपने शुरुआती दिनों में सर्वहारा राज्य  धनी कुलको को अपना प्रहार का केंद्र नहीं बनाया। सोवियत संघ में लेनिन और स्टालिन के अनुभव पर जिन साथियों को बहस करना है उन्हें नई आर्थिक नीति से लेकर खेती के सामूहिकीकरण के प्रारंभिक दौर पर अपना सैद्धांतिक बहस चलाना चाहिए ।
आज का आंदोलन यदि महज एम एस पी को लागू रखने का भी आंदोलन होता तो यह समाजवाद की दिशा में राजकीय पूंजीवाद को बचाए रखने की लडाई होता जो कि एकाधिकार पूंजीपति और वित्त पूंजी के द्वारा संचालित व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष के रूप में सामने है । । यह आंदोलन एम एस पी से कहीं आगे बाजार व्यवस्था के खिलाफ,  वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन के माध्यम से वित्त पूंजी द्वारा थोपी गई शर्तों के खिलाफ एक व्यापक जनांदोलन है जो फासीवादी राज्य सत्ता  के सामने मजबूत चुनौती पेश कर रहा है । जो लोग अगर मगर करके इस आंदोलन का मजाक उड़ा रहे हैं, जो इस आंदोलन से दूर हैं, वे जाने अनजाने मेहनतकश किसानों और भोजन के लिए पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (पी डी एस ) के माध्यम से राज्य पर निर्भर गरीब आबादी के खिलाफ बड़ी पूंजी के मौन समर्थन के अपराधी हैं । MSP के विरोध में आग उगलने वाले साथियों को समझना होगा कि किसी भी फसल की कीमत बढ़ाने की लड़ाई और एमएसपी यानी की सरकारी खरीद को बनाए रखने की लड़ाई में फर्क होता है । फसल की कीमत बढ़ाने की लड़ाई धनी किसानों के फायदे की आर्थिक लड़ाई मानी जा सकती है । लेकिन सरकारी खरीद को जारी रखने की लड़ाई पूंजीवाद के हिस्से के रूप में राजकीय पूंजीवाद को बनाए रखने की लड़ाई है ।

आज के किसान आंदोलन में एंगेल्स तथा लेनिन के विचारों के आधार पर मजदूर वर्ग की क्या भूमिका हो ?



कई साथी सिर्फ लेनिन तथा एंगेल्स के उद्धरण पेश कर रहे हैं। उन्हें आज के किसान आंदोलन के संदर्भ में उसका विश्लेषण भी पेश करना चाहिए। इस लेख में । 'फ्रांस तथा जर्मनी में किसान का सवाल ' लेख से दो उद्धरण पेश किया जा रहा है जिसका कई साथी संदर्भ से हट कर अलग - अलग अर्थ निकाल रहे हैं । जबकि एक ही लेख में किसानों के प्रति संपूर्णता में मजदूर वर्ग और उसकी पार्टी के दृष्टिकोण को पेश करने के लिए एंगेल्स ने ये सारी बातें लिखी है। पहले एंगेल्स के उस पक्ष को उद्धृत कर विचार किया जाए जिसमें वह पूंजीवाद में छोटी खेती के पुराने उत्पादन संबंध को अनिवार्य रूप से समाप्त होने की बात करते हैं । एंगेल्स लिखते हैं "हमारी पार्टी का यह कर्तव्य है कि किसानों को बारंबार स्पष्टता के साथ जताए कि पूंजीवाद का बोलबाला रहते हुए उनकी स्थिति पूर्णतया निराशापूर्ण है, कि उनकी छोटी जोतों को इस रूप में बरकरार रखना एकदम असंभव है, कि बड़े पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन उनके छोटे उत्पादन की अशक्त , जीर्ण-शीर्ण प्रणाली को उसी तरह कुचल देगा, जिस तरह रेलगाड़ी ठेला गाड़ी को कुचल देती है। ऐसा करके हम आर्थिक विकास की अनिवार्य प्रवृत्ति के अनुरूप कार्य करेंगे ।और यह विकास एक न एक दिन छोटे किसानों के मन में हमारी बात को बैठाए  बिना नहीं रह सकता। (पृ.385)
    तो क्या यह बात भारत के आंदोलनकारी किसानों को उनके आंदोलन से दूर रहकर मजदूर वर्ग समझा सकता है? हम किसान आंदोलन में मजदूर वर्ग के कई संगठन को बड़ी पूंजी और फासीवाद के खिलाफ उनके संघर्ष का समर्थन तथा उसमें भागेदारी करते पा रहे हैं। ऐसे ही मजदूर संगठन के कार्यकर्ताओं को एक ऐसी पुस्तिका बेचते और बताते पाया कि जिसमें बताया गया है कि छोटे किसानों की खेती पूंजीवाद में अनिवार्य रूप से तबाह हो जाएगी। मजदूरों का यह संगठन पूरी सक्रियता से दिल्ली के आसपास के किसान आंदोलन में भागीदारी कर रहा है। किसान उनकी बात सुन रहे हैं । लेकिन क्या इस आंदोलन से दूर रहकर या बड़े पूंजीपतियों और फासीवादी सरकार के खिलाफ चल रहे आंदोलन का उपहास करते हुए उन्हें यह बात समझाई जा सकती है ?
   अपने उसी लेख में एंगेल्स आगे लिखते हैं," ....मझोला किसान जहां छोटी जोत वाले किसानों के बीच रहता है ,वहां उसके हित और विचार उनके हित और विचारों से बहुत अधिक भिन्न नहीं होते। वह अपने तजुर्बे से जानता है कि उसके जैसे कितने ही लोग छोटे किसानों की हालत में पहुंच चुके हैं ।पर जहां मझोले और बड़े किसानों का प्राधान्य होता है और कृषि के संचालन के लिए आम तौर पर नौकर और नौकरानियों की आवश्यकता होती है, वहां बात बिल्कुल दूसरी ही है ।कहने की जरूरत नहीं कि मजदूरों की पार्टी को प्रथमत: उजरती मजदूरों की ओर से, यानी इन नौकरों- नौकरानियों और दिहाड़ीदार मजदूरों की ओर से ही लड़ना है। किसानों से ऐसा कोई वादा करना निर्विवाद रूप से निषिद्ध है, जिसमें मजदूरों की उजरती गुलामी को जारी रखना सम्मिलित हो। परंतु जब तक बड़े और मझोले किसानों का अस्तित्व है ,वे उजरती मजदूरों के बिना काम नहीं चला सकते ।इसलिए छोटी जोत वाले किसानों को हमारा यह आश्वासन देना कि वह इस रूप में सदा बने रह सकते हैं, जहां मूर्खता की पराकाष्ठा होगी, वहां बड़े और मझोले किसानों को यह आश्वासन देना गद्दारी की सीमा तक पहुंच जाना होगा।      (पृ.385-86)
किसानों के पूंजीवादी प्रवृत्तियों और कमजोरियों पर प्रकाश डालते हुए एंगेल्स लिखते हैं : -
       ...." हमें आर्थिक दृष्टि से यह पक्का यकीन है कि छोटे किसानों की तरह बड़े और मझोले किसान भी अवश्य ही पूँजीवादी उत्पादन और सस्ते विदेशी गल्ले की होड़ के शिकार बन जायेंगे। यह इन किसानों की भी बढ़ती हुई ऋणग्रस्तता और सभी जगह दिखाई पड़ रही अवनति से सिद्ध हो जाता है।, ."(पृ.386)  
   आज के किसान आंदोलन में भागीदारी कर रहे छोटे यहां तक की बड़े किसान भी मजदूर वर्ग की पार्टी या संगठन द्वारा समझाने के पहले ही समझ रहे हैं कि बड़ी पूंजी के हमले के कारण उनकी खेती उजड़ जाएगी। जाहिर सी बात है कि एक वर्ग के रूप में छोटी पूंजी के मालिक यानी टुटपुंजिया वर्ग बड़ी पूंजी के हमले के खिलाफ अपने अस्तित्व के बचाव के लिए लड़ेगा ही।  कोई भी मजदूर वर्ग की पार्टी उसे बड़ी पूंजी के सामने आत्मसमर्पण करने की सलाह नहीं दे सकता है। यदि आप उसका उपहास उड़ाएंगे या आप उसे ज्ञान देंगे कि तुम्हारी बर्बादी निश्चित है तो उन किसानों का जवाब होगा कि "बंधु ! बर्बाद होने से तो लड़ते-लड़ते मर जाना अच्छा है '। इसलिए पूंजीवाद के सामने निष्क्रिय विरोध या आत्मसमर्पण कर देने का सलाह हम नहीं दे सकते हैं। 
चुपचाप रह जाने की नीति पर चलते हुए जो साथी सिर्फ उद्धरणों को पेश करते हैं उनसे हमारा सवाल है कि आप किसानों को क्या कहना चाहते हैं ? क्या उन्हें लड़ाई नहीं लड़ना चाहिए ? बड़ी पूंजी के खिलाफ फासीवादी शक्तियों के खिलाफ अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए क्या किसानों को चुपचाप से बड़ी पूंजी के इस हमले को सहते हुए बिखर जाना चाहिए ?
एगेल्स चुप्पी या निष्क्रयता का विरोध करते हैं।वह किसानों के तबादला ने तक इंतजार करने की राजनीति का भी विरोध करते हैं। मजदूर वर्ग की ऐतिहासिक जिम्मेवारी को बताते हुए और किसानों को अपने साथ ला खड़ा करने के लिए स्पष्ट दिशा निर्देशन देते हुए एंगेल्स आगे लिखते हैं, " सर्वहारा की पांतों में जबरन ढकेले जाने से हम जितने ही अधिक किसानों को बचा सकें, जितने अधिक को किसान रहते हुए ही हम अपनी ओर कर सकें, उतनी ही जल्दी और आसानी से सामाजिक कायापलट संपन्न होगा। इस कायापलट को तब तक टालने से , जब तक कि पूंजीवादी उत्पादन सर्वत्र अपनी चरम परिणति पर ना पहुंच जाए और हर छोटा दस्तकार और हर छोटा किसान बड़े पैमाने के पूंजीवादी उत्पादन का शिकार न बन जाए, हमारा कोई हित साधन नहीं होगा। इसके लिए किसानों के हितार्थ जो माली कुर्बानी करनी होगी, जिसकी पूर्ति सार्वजनिक कोष से की जाएगी, वह पूंजीवादी अर्थतंत्र के दृष्टिकोण से पैसों की बर्बादी मानी जा सकती है , किंतु वस्तुतः धन का अति उत्तम विनियोग है, क्योंकि उससे आम सामाजिक पुनः संगठन के खर्च में संभवत 10 गुनी बचत होगी। अतः इस अर्थ में किसानों के साथ हम अत्यंत उदारता का व्यवहार करने में समर्थ है।"
  फ्रांस और जर्मनी में किसानों का सवाल पुस्तिका में एंगेल्स के विचार..... खंड 3 भाग 2 ' ।
ये उद्धरण एक ही लेख में लगभग एक ही जगह है । इसलिए इन दोनों उद्धरण को संपूर्णता में ही समझा जाना चाहिए और वर्तमान आंदोलन से जोड़कर इसकी व्याख्या की जानी चाहिए । एंगेल्स  लिखते हैं कि छोटे किसानों की तबाही के लिए इंतजार करने में मजदूर वर्ग का कोई भला नहीं है। यही वह महत्त्वपूर्ण पंक्ति है जो हमें इस आंदोलन के समर्थन में खड़ा होते हुए पूंजीवाद के हमले में किसानो की खेती के अनिवार्य तौर पर तबाही की बात मजदूरों द्वारा किसानों को समझाने का निर्देश देता है |
 भारत के किसान एक दमनकारी फासीवादी राज्य से लड़ रहे हैं । वे वित्त पूंजी और एकाधिकार पूंजी के बड़े हमले के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। इस संघर्ष में साथ देकर ही सामान्य किसानों को समझाया जा सकता है कि पूंजीवाद के अंतर्गत वे अपनी खेती नहीं बचा सकते हैं।
एंगेल्स तथा लेनिन जब इस तरह की बातें कहते हैं तो किसानों के सामने कहीं उन से आगे बढ़कर लड़ने और नेतृत्व देनेवाले संगठित मजदूर वर्ग खड़े होते हैं । आज भारत में मजदूर वर्ग और उनके संगठन की भारी कमजोरी यह है कि श्रम कानूनों में लगातार मजदूर विरोधी होने वाले सुधारों और मजदूर वर्ग के छीने जा रहे अधिकारों के बावजूद पूंजीवाद और उसकी फासीवादी सत्ता के खिलाफ कोई प्रतिरोध संघर्ष खड़ा नहीं कर पाए हैं| ऐसी स्थिति में हम किसानों को मजदूरों के पीछे आने के लिए राजनीतिक तौर पर आवाहन करने का भौतिक आधार भी तैयार नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए सबसे पहले तो मजदूर वर्ग की जितनी भी ताकत है उसे संगठित करके मजदूर वर्ग को श्रम कानूनों में हुए सुधारों के खिलाफ मजबूत संघर्ष की तैयारी करनी चाहिए। साथ ही जन विरोधी कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष को आगे ले जाना चाहिए और किसानों को इस लड़ाई में साथ देने का आवाहन करना चाहिए न कि हमें किसानों की इस लड़ाई को धनी किसानों की लड़ाई कह कर के चुप रहना चाहिए या मजदूर वर्ग को इससे अलग रहने की सलाह देनी चाहिए। वर्तमान में आंदोलनकारी किसान इस बात को समझ रहे हैं कि वे तबाह होने वाले हैं इसीलिए वे लड़ रहे हैं । वे इतिहास की गति नहीं समझते हैं लेकिन इतिहास ने किसानों पर समाजवाद के निर्माण की जिम्मेदारी भी नहीं दी है । यह जिम्मेवारी मजदूर वर्ग, उसके संगठन और पार्टी को दी है जो ऐसे ऐतिहासिक क्षण में या तो चुप हैं या उद्धरण का खेल खेल रहे हैं और सिर्फ लंबे-लंबे लेख लिख रहे हैं ।
जब छोटे और मझोले किसान बड़े पूंजीपतियों से और राज्य से अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हों तो ये सारी बातें उन्हें समझाते हुए हमें क्या तटस्थ रहना चाहिए या बड़ी पूंजी के खिलाफ और फासीवादी राज्य के खिलाफ उनके संघर्ष का समर्थन करना चाहिए ? एंगेल्स तथा लेनिन अपनी रचनाओं में इस बात पर जोर देते हैं कि समाजवादी यानी मजदूर वर्ग की पार्टी या मजदूर उनके छोटे जोत को बचाए रखने की गारंटी नहीं दे सकते हैं। यानी पूंजीवाद के रहते हुए बड़ी पूंजी उनकी छोटी पूंजी को अनिवार्य रूप से निगल जाएगा । इसलिए किसानों को बड़ी पूंजी के खिलाफ संघर्ष करते हुए मजदूरों के साथ तथा मजदूरों के नेतृत्व में आना चाहिए और समाजवाद के लिए संघर्ष में साथ देना चाहिए, ताकि उनके उत्पादों का सही मूल्य मिल सके और तर्कपूर्ण ढंग से मुनाफा के बजाए समाज की आवश्यकओं को केंद्र में रखकर उत्पादन किया जा सके और समाज के लिए उसे उपयोग में लाया जा सके।  बदले में किसानों को समाजवादी राज्य उत्पादन के तमाम साधनों तथा उत्पादों को पूरी तरह से खरीदने की गारंटी देगी। इस तरह से किसानों को एक बेहतर जीवन दिया जा सकेगा। समाजवादी राज्य ने सोवियत संघ में यही किया था।
  हमें लेनिन की यह बात याद रखना चाहिए, "सर्वहारा वर्ग वस्तुतः क्रांतिकारी, वस्तुतः समाजवादी ढंग से काम करने वाला वर्ग केवल उसी सूरत में होता है, जब वह समस्त मेहनतकशों तथा शोषितों के हरावल के रूप में शोषकों का तख्ता पलटने के लिए संघर्ष में उनके नेता के रूप में सामने आता है और काम करता है। परंतु यह काम वर्ग संघर्ष देहात में पहुंचाए बिना, देहात के मेहनतकश जनसाधारण को शहरी सर्वहारा की कम्युनिस्ट पार्टी के इर्द-गिर्द एकबद्ध किए बिना, सर्वहारा वर्ग द्वारा देहाती मेहनतकशों को शिक्षित-दीक्षित किए बिना पूरा नहीं हो सकता।" -कृषि प्रश्न पर थिसिसों का आरंभिक मसविदा, लेनिन नई संकलित रचनाएं, भाग- 4
भारत के आज की स्थिति में यह स्वीकार करना चाहिए कि लेनिन ने सर्वहारा वर्ग के जिस कार्यभार को रेखांकित किया है, उसे भारत के मजदूर वर्ग और उनके  संगठन   पेश कर में असफल रहे हैं ।अन्य शोषित उत्पीड़ित वर्गों के आंदोलन के समय ऐसी पहलकदमी का सर्वथा अभाव रहा है। अनिवार्य रूप से हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि मजदूर वर्ग मजदूर आंदोलन के साथ-साथ किसान आंदोलन को संगठित करने में ऐतिहासिक तौर पर यदि असफल नहीं रही तो कमजोर अवश्य रही है ।मजदूर आंदोलन ट्रेड यूनियन की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ पाया । आज तो ट्रेड यूनियन की सीमाओं में लड़े जाने वाले श्रम कानूनों में पूंजी के पक्ष में हो रहे संशोधनों के खिलाफ भी युनियन नहीं लड़ पा रही है। साथ ही किसान सहित अन्य जनवादी आंदोलनों में अपनी भागीदारी करने में काफी पीछे रही है। ऐसी स्थिति में हमें मजदूर वर्ग के बीच में काम करने वाले राजनीतिक संगठन के तौर पर अपना आत्मअवलोकन करना चाहिए क्योंकि मजदूरों के मजबूत और राजनीतिक संघर्ष खड़ा किए बगैर किसान या दूसरे शोषित उत्पीड़ित समाज उसके नेतृत्व में या उसके साथ कैसे और क्यों आएंगे ?

नरेंद्र कुमार

नाज़िम हिकमत के जन्मदिवस के अवसर पर...



बीजों में, धरती में, सागर में भरोसा करना,
मगर सबसे अधिक लोगों में भरोसा करना।
बादलों को, मशीनों को, और किताबों को प्यार करना, 
मगर सबसे ज्यादा लोगों को प्यार करना।
ग़मज़दा होना 
एक सूखी हुई टहनी के लिए,
एक मरते हुए तारे के लिए, 
और एक चोट खाए जानवर के लिए,
लेकिन सबसे गहरे अहसास रखना लोगों के लिए।
खुशी महसूस करना धरती की हर रहमत में --
अँधेरे और रोशनी में,
चारों मौसमों में,
लेकिन सबसे बढ़कर लोगों में। 

-नाज़िम हिकमत ('मेरे बेटे के नाम आख़िरी चिट्ठी' से)